बिरयानी की जंग: हर शहर को लगता है देग उसी की है
दम वाली या मिली हुई, केवड़ा या पुदीना, आलू या बगावत — देश की सबसे विवादित डिश का कूटनीतिक सर्वे।

कोई भी व्यंजन बिरयानी जितना इलाकाई गर्व नहीं जगाता। हर क्षेत्र को यकीन है कि असली बिरयानी उसी की है — यह दावा शादियों में, दफ्तरों में और कम से कम एक फैमिली ग्रुप में इतनी शिद्दत से लड़ा गया कि ग्रुप हफ्ते भर म्यूट करना पड़ा।
दोनों घराने वाकई अलग हुनर हैं। एक परंपरा देग को आटे से सील कर भाप को चावल और गोश्त का रिश्ता बनाने देती है; दूसरी सबको साथ पकाकर उसे ईमानदारी कहती है। अकेले आलू के सवाल ने दोस्तियां तोड़ी हैं और एक दर्ज मामले में रिश्ता भी तय करवाया है।
सड़क के संस्करण नक्शा और उलझा देते हैं: रेलवे बिरयानी की अपनी नॉस्टैल्जिया है, हॉस्टल की संडे बिरयानी के इर्द-गिर्द पूरा हफ्ता सजता है, और रात एक बजे की वह प्लेट जिसका स्वाद हर परीक्षार्थी को याद है।
हमारे सर्वे का इकलौता सुरक्षित निष्कर्ष: सबसे अच्छी बिरयानी किसी की मां के हाथ की है, दूसरे नंबर पर वह जिसकी कतार में आप बड़े हुए — और इसके आगे की हर रैंकिंग महज उकसावा है।



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